बलिया का सुरहा ताल देश का सौवाँ रामसर स्थल घोषित

बलिया का पूर्वी हिस्सा विशेषकर गंगा और घाघरा के दोआबा का हिस्सा सुरहा ताल से मांझी संगम तक अनेकों छोटे बड़े तालों की प्राकृतिक शृंखला है. 

कल विश्व पर्यावरण दिवस था.  माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने बलिया के सुरहा ताल को देश का सौवाँ रामसर स्थल घोषित किया तो मन में एक संतोषजनक अनुभूति हुई। मेरे लिए यह घोषणा केवल एक सरकारी निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस धरती की पहचान है जिसे मैं बचपन से जानता हूँ और जिसमें हमारी जड़ें हैं.

यदि आप देखेंगे तो पाएंगे कि बलिया का कोई भी छोटा अथवा बड़ा नेता, हारा अथवा जीता नेता, जीता अथवा मनोनीत नेता या हाल फ़िलहाल में विद्वत समाज मे इसकी मांग रही हो या रामसर के रूप में चर्चा में रही हो. 

हाँ, माननीय मंत्री जी दयाशंकर सिंह सहित तमाम सोशल मीडिया समूह  बलिया में केवल कटहर नाला को जुहू चौपाटी बनाने की राजनीति चल रही थी, उस समय 20 मार्च को एक साधारण सी फेसबुक पोस्ट लिखी थी. विषय था बलिया का प्राकृतिक भूगोल.

उस पोस्ट में लिखा था कि बलिया का उत्तरी छोर गंगा और सरयू घाघरा के दोआबे में स्थित है. सरयू नदी ने सदियों पहले अपना मार्ग बदला और उस मार्ग परिवर्तन से बलिया के उत्तरी छोर पर पश्चिम से पूर्व तक गंगा घाघरा संगम तक तालों की एक प्राकृतिक शृंखला बन गई. सुरहा ताल उसी शृंखला की सबसे बड़ी कड़ी है, सरयू का छाड़न, गोखुर झील. हालांकि, 20 मार्च के पोस्ट में नेता जी लोग के बयानों से सुनकर उनकी तथ्यात्मक गलतियां सुधार कर 22 मार्च को फिर से एक पोस्ट लिखा था. 

यह भी लिखा था कि कटहर नाला सुरहा ताल को गंगा से जोड़ता है.जब गंगा में बाढ़ हो तो दक्षिण से उत्तर प्रवाह और जब सरयू में बाढ़ हो तो उत्तर से दक्षिण प्रवाह. अर्थात यह नाला बाढ़ संतुलन का एक प्राकृतिक तंत्र है. इसी पोस्ट में यह भी जोड़ा था कि बलिया का विकास जुहू चौपाटी बनाने में नहीं बल्कि रामसर साइट की सही पहचान और उद्धार में है.

22 मार्च को उसी पोस्ट को अद्यतन करते हुए लिखा था कि एक बड़े महत्व की चीज को एक बड़े छोटे चश्मे से देखा जा रहा है. सुरहा ताल अकेला नहीं है. रेवती का दह, दलछपरा ताल, कोल नाला, यह सब मिलकर एक विशाल प्राकृतिक आर्द्रभूमि तंत्र बनाते हैं. बैरिया विधानसभा का पुराना नाम दोआबा था और बासडीह का खरीका, और कोल नाला इन दोनों की प्राकृतिक सीमा रेखा था. यह केवल भूगोल नहीं, बलिया का इतिहास भी है.

उसी पोस्ट में एक षट्सूत्रीय कार्ययोजना भी रखी थी. पहला, सुरहा ताल से गंगा घाघरा संगम तक के समस्त जल स्रोतों की मानचित्रण. दूसरा, दलछपरा छठ घाट वाले नहर के वास्तविक फैलाव का उद्धार. तीसरा, कोल नाला का चकिया और रानीगंज होते हुए वास्तविक फैलाव चिन्हित करना.चौथा, घाघरा पेयजल परियोजना और गंगा सिंचाई परियोजना में व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति. पाँचवाँ, रामसर साइट का उद्धार कर प्रवासी पक्षियों में पुनः विश्वास बहाली. छठा, सुरहा ताल से गंगा तक जलक्रीड़ा पर्यटन की संभावनाओं की तलाश.

आज फिर से जब गूगल सर्च किया तो जानकर अच्छा लगा कि पाँचवें और छठे बिंदु पर सरकार काम कर रही है. मैरितार गाँव में चार करोड़ निन्यानबे लाख रुपये की योजना, बर्ड वाचिंग टावर, ओपन एयर थिएटर. शेष चार बिंदु अभी भी प्रतीक्षारत हैं.

बलिया हिमालय के उपतराई की निचली भूमि में है.इसे तालों और नालों की भूमि कहना अतिशयोक्ति नहीं. यहाँ के नाले वे हैं जो तालों के जल को नदियों से जोड़ते हैं. कटहर नाला और कोल नाला दोनों गंगा और घाघरा के प्राकृतिक संगम से पहले ही इन दोनों नदियों को जोड़ते हैं. यह प्रकृति की अद्भुत अभियांत्रिकी है. पर वर्तमान में उद्धार की राह ढूँढ रहीं है. 

मेरे गाँव का ताल भी इसी विशाल प्राकृतिक शृंखला का हिस्सा है. बचपन में साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी देखे थे. फिर शिकारियों ने रात के तीन बजे गोलियाँ चलाईं और वे पक्षी आना बंद हो गए. उनकी वापसी की प्रतीक्षा आज भी है.

अभी भी एक जिज्ञासा शेष है. कोल नाला कहाँ तक जाता है? क्या कवि केदारनाथ सिंह जी के चकिया गाँव से रानीगंज बाजार होते हुए जो जलधारा है वही कोल नाला है? क्या रेवती दह अर्थात दलछपरा ताल का जल इसी कोल नाला के माध्यम से गंगा से मिलता है? 

बलिया से होने के नाते मुझे यह बहुत अच्छा लगा कि रामसर की सम्भावनाओं के प्रति मेरी स्पष्ट जिज्ञासा ना केवल पूर्णरूपेण सही थी,  ब्लकि अग्रगामी भी रहा.  डॉ. संतोष कुमार सर उस पोस्ट पर कहते है कि बलिया जलक्रीड़ा और झील आधारित पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है, वहीँ जनार्दन यादव सर ने वीडियो बनाने की इच्छा जताई.

आज जब घोषणा हुई तो मेरा प्रथम उद्गार था पहले से ही लिखा था. श्रेय के लिए नहीं चाहिए पर मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि 20 मार्च की पोस्ट इतना सही है.  

बलिया को चाहिए वह  अपनी असली पहचान- बागी बलिया, साहित्य की बलिया, और अब तालों, नालों और प्रवासी पक्षियों की बलिया. शेष चार बिंदुओं पर काम होने की प्रतीक्षा रहेगी.

दिनाँक 20 और 22 मार्च के फ़ेसबुक पोस्ट के आधार पर अमित भूषण के विचार एवं जुड़ाव 
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