विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026


विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026

जैसा कि हम सभी जानते हैं, इन दिनों हमारे प्रधानमंत्री कई देशों के दौरे पर हैं। इसी क्रम में 19 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 43 वर्षों में पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में नॉर्वे के द्विपक्षीय दौरे पर थे। नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन के समापन पर जब वे कक्ष से बाहर जा रहे थे, तब नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने एक सीधा सवाल किया कि प्रधानमंत्री जी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते। प्रधानमंत्री इसका बिना जवाब दिए ही आगे बढ़ गए। यह वीडियो कुछ ही घंटों में वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
इस घटनाक्रम के बाद ओस्लो स्थित भारतीय दूतावास ने स्वयं हेले लिंग को विदेश मंत्रालय की प्रेस वार्ता में आमंत्रित किया। वे वहाँ आईं और उन्होंने तीन अत्यंत तीखे और सीधे सवाल पूछे कि भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करते हुए वैश्विक समुदाय आप पर भरोसा क्यों करे, क्या आप अपने देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने का स्पष्ट वादा करेंगे, और क्या भारत के प्रधानमंत्री भविष्य में कभी घरेलू या अंतरराष्ट्रीय प्रेस के कठिन सवालों का सीधा सामना करेंगे। इन सवालों के उत्तर देने के बजाय नॉर्वे में भारत के राजदूत सिबी जॉर्ज ने उन्हें बीच में टोका और यह याद दिलाते हुए कि यह उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस है, लगभग 17 मिनट तक भारत के संविधान, न्यायपालिका, योग और प्राचीन सभ्यता का विस्तृत बखान किया। तीनों बुनियादी सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं आया। यही वह निर्णायक क्षण था जब प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में रैंक 1 और रैंक 157 का अंतर केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी स्पष्ट दिखता है।
इस परिघटना का अन्य दृष्टियों से तुलनात्मक विश्लेषण करने से पहले तीन बातें स्पष्ट करना चाहूँगा। एक, कक्ष से बाहर जाते हुए प्रधानमंत्री सवाल का जवाब दें, यह कोई अनिवार्य नहीं था, हमारे अधिकारी हैं जो इसका जवाब दे सकते हैं। दूसरी बात यह कि इसमें कोई बहुत आश्चर्य नहीं कि पश्चिमी मीडिया भारत के प्रति पक्षपाती रिपोर्टिंग भी करता है, जैसा कि हमने देखा होगा कि पहलगाम में जब आतंकवादी हमला हुआ तो बाहरी मीडिया उसे चरमपंथी हमला बता रहे थे। परंतु मेरा मुख्य बिंदु यह है कि यदि प्रधानमंत्री ने जवाब नहीं दिया और हम उन्हें जवाब के लिए मीडिया कॉन्फ्रेंस में बुलाते हैं और जवाब अंत तक नहीं दे पाते, यह वस्तुतः ऐसी चीज है जो स्पष्ट रूप से दिखती है।
यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि हेले लिंग के सवालों का जवाब देना असंभव नहीं था। भारत के पास कहने को बहुत कुछ है। मनमोहन सिंह के काल से लेकर आज तक हमारे यहाँ स्थिर सरकारें रही हैं। मोदी जी लगातार तीसरी बार सत्ता में हैं जो जनादेश की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। नियमित और निष्पक्ष चुनाव होते हैं। मानवाधिकार के क्षेत्र में भी हमने निरंतर प्रगति की है। स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और डिजिटल समावेश जैसे मोर्चों पर ठोस काम हुआ है जिसे आँकड़ों सहित रखा जा सकता था। यदि भारत के प्रतिनिधि उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन तथ्यों को सीधे और आत्मविश्वास के साथ रखते तो वह भारत की सबसे प्रभावशाली कूटनीतिक प्रस्तुति होती। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। सवालों से बचने की कोशिश में हम वह अवसर गँवा बैठे जब हम दुनिया के सामने अपनी लोकतांत्रिक उपलब्धियों को गर्व के साथ रख सकते थे। यह चूक तथ्यों की कमी से नहीं, आत्मविश्वास की कमी से हुई।
इस पूरे प्रसंग को और गहराई से समझने के लिए इसे हम तुलनात्मक दृष्टिकोण से भी देख सकते हैं। भारत में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के जो साक्षात्कार हाल के वर्षों में प्रसारित हुए, उनमें अक्सर बेहद सतही प्रश्न पूछे गए कि आप बटुआ रखते हैं या नहीं, दिन में 18 घंटे काम कैसे कर लेते हैं, या चेहरे पर इतनी रौनक कैसे रहती है। यहाँ तक कि अन्य शीर्ष राजनेताओं को देखें तो वे कॉमेडी चैनलों, फूड सीरीज के पॉडकास्ट आदि पर आते हैं और गैर-राजनीतिक विषयों पर साक्षात्कार करते हैं। दूसरी ओर हेले लिंग जैसी पत्रकार थीं जिन्होंने अपने संक्षिप्त अवसरों में सीधे मानवाधिकार, लोकतांत्रिक जवाबदेही और प्रेस स्वतंत्रता जैसे मौलिक विषयों को छुआ। यह केवल दो पत्रकारों के दृष्टिकोण की तुलना नहीं है, बल्कि दो भिन्न पत्रकारिता संस्कृतियों का अंतर्विरोध है। एक वह पत्रकारिता है जो सत्ता को निष्पक्ष आईना दिखाती है और दूसरी वह जो केवल सत्ता का गुणगान करती है। यही कारण है कि आज भारत प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में अपने कई पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और भूटान से भी पीछे दिखाई दे रहा है।
यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स यानी आरएसएफ द्वारा प्रतिवर्ष जारी किया जाता है। इस वर्ष 30 अप्रैल 2026 को प्रकाशित वैश्विक रिपोर्ट का शीर्षक ही अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है — पच्चीस वर्षों में प्रेस स्वतंत्रता का निम्नतम स्तर। वर्ष 2002 में दुनिया के केवल 13.7 प्रतिशत देश कठिन या अत्यंत गंभीर श्रेणी में थे, जो आज बढ़कर 52.2 प्रतिशत हो चुके हैं। संतोषजनक प्रेस स्वतंत्रता के दायरे में रहने वाली वैश्विक आबादी 20 प्रतिशत से घटकर अब 1 प्रतिशत से भी कम रह गई है। इस सूचकांक में नॉर्वे 92.72 अंकों के साथ शीर्ष पर है, जबकि भारत मात्र 31.96 अंकों के साथ 157वें स्थान पर संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सुरक्षा और विधायी — हर एक कसौटी पर भारतीय मीडिया का स्कोर नॉर्वे के एक तिहाई से भी कम है।
वर्तमान दौर में एक बड़ा विरोधाभास और दिखाई देता है। एक तरफ जहाँ मीडिया और सोशल मीडिया का विस्तार अभूतपूर्व गति से हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ खोजी, निर्भीक और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। जो पत्रकार या संस्थान निष्पक्ष रिपोर्टिंग का साहस दिखाते हैं, उन्हें अक्सर डिजिटल सेंसरशिप, खातों के निलंबन, वीडियो हटाने, संगठित ट्रोलिंग और व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक किए जाने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हेले लिंग के इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट उनके सवाल पूछने के कुछ ही घंटों बाद निलंबित हो गए। यह केवल एक नॉर्वेजियन पत्रकार के साथ नहीं हुआ। इससे पहले 2023 में वाशिंगटन में जब वॉल स्ट्रीट जर्नल की पत्रकार सबरीना सिद्दीकी ने प्रधानमंत्री से मानवाधिकारों पर सवाल पूछा तो उन्हें भी भारी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा और अंततः व्हाइट हाउस को उनके बचाव में आना पड़ा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना कोई अपराध नहीं है, परंतु वर्तमान परिदृश्य में इसके प्रति बढ़ता रवैया चिंताजनक है।
लोकतंत्र में तीखे और स्वस्थ सवाल उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक ताकत के परिचायक होते हैं। जब प्रेस बिना किसी भय या पक्षपात के निर्भीकता से काम करती है, तभी लोक नीतियाँ अधिक व्यावहारिक और विवेकपूर्ण बनती हैं, शासन प्रणाली में पारदर्शिता आती है और नागरिक अधिक जागरूक होते हैं। यदि हम चाहते हैं कि भारत केवल संख्या और बाजार के लिहाज से नहीं, बल्कि नैतिक और गुणात्मक मूल्यों में भी विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र बने, तो असहमतियों और कठिन प्रश्नों को मुख्यधारा के मंचों पर स्वतंत्र रूप से आने-जाने देना होगा। प्रधानमंत्री द्वारा नियमित और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करना केवल एक राजनयिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की अनिवार्य आवश्यकता है। ओस्लो में उठाया गया वह सवाल भले ही उस शाम अनुत्तरित रह गया हो, लेकिन वह सवाल आज भी लोकतांत्रिक चेतना की हवा में तैर रहा है और उसका जवाब भारत को खुद खोजना होगा।
-अमित भूषण द्विवेदी 

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